कमर में हाथ डाला, दुपट्टा खिंचा….पति को बचाने के लिए सबकुछ सहती रही महिला, कोरोना से मौत होते ही फूट-फूट कर रोने लगी, पूरी बात जान खून खौल उठेगा

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पटनाः भागलपुर के ग्लोकल अस्पताल में अपने पति रौशन का इलाज कराने आई महिला रुचि रौशन के साथ इलाज के नाम पर दुपट्टा खींचने जैसी घटिया हरकत की गई. इतना ही नहीं बल्कि रुचि के साथ पटना के राजेश्वर हॉस्पिटल में भी एक डॉक्टर ने बदतमीजी की. पति के मौत के बाद महिला मीडिया के सामने फूट-फूट कर रोने लगी और अपनी दर्द भरी दास्तां सुनायी.

महिला ने कहा- “सर! हमलोग नोएडा में रहते हैं मैं और मेरे हसबैंड. होली में हमलोग बिहार आए थे. पूरी फैमिली का गेट-टूगेदर था. नौ तारीख को मेरे हसबैंड की तबीयत खराब हुई. फीवर हुआ उनको काफी तेज. हमने कोरोना का दो-दो तीन-तीन बार टेस्ट करवाया लेकिन निगेटिव आया. आरटीपीसीआर के लिए भागलपुर में दिया तो एक दिन दो दिन करते-करते दस दिन तक रिपोर्ट नहीं आया. फिर नोएडा के एक डॉक्टर हैं उनसे कंसल्ट किया. उन्होंने बोला कि सिटी चेस्ट करवाना है. हमलोग भागलपुर गए और सिटी चेस्ट करवाए तो उसमें इनका इंफेक्शन आया. 60 परसेंट उनका लंग्स इफेक्टेड था. डैमेज नहीं था. बाकि लंग्स का हर चीज परफेक्ट था. सारा चीज… नाक का गले का सबकुछ नॉर्मल था.”

नर्स, डॉक्टर सारे थे जल्लाद

“हमलोग नेक्स्ट डे ग्लोकल हॉस्पिटल है भागलपुर में वहां लेकर आए और एडमिट कराए आईसीयू में. मेरी मदर की भी तबीयत खराब थी. मेरी मम्मी और मेरे हसबैंड दोनों एक साथ एडमिट हुए. वहां पर इतनी लापरवाही हुई उनके साथ. डॉक्टर्स आते थे बस विजिट के लिए फिर देखकर गए. इसके अलावा वहां जितने भी नर्स थे, कंपाउंडर्स थे… सारे के सारे जल्लाद थे सर! कोई दवाई तक नहीं देना चाहता था. मेरी मदर टचवूड बेटर कंडीशन में थी लेकिन मेरे हसबैंड बोल भी नहीं पा रहे थे उस समय तक. इशारे से पानी के लिए बताते थे. वो मुझे हार कर फोन करते थे सर कि पानी पिला दो.

जब मैं अंदर जाती थी तो ये लोग हल्ला करते थे. फिर भी मैं जाकर उनको पानी पिलाती थी, जूस पिलाती थी. रेमडेसिविर का नाम आपलोगों ने सुन लिया होगा कि कितनी मुश्किल से मिलती है. मेरे दो-दो पेशेंट थे वहां. हमने बहुत मुश्किल से अरेंज किया. जब वह इंजेक्शन मिला तो एक दिन रात में जब इंजेक्शन देने लगे तो हाफ इंजेक्शन फ्लोर पर गिरा दिया. हमने कहा कि इतना महंगा इंजेक्शन है इसी का असर होकर ठीक होते ये. आपने कैसे गिरा दिया. उन्होंने कहा कि 50 हजार का भी गिरा देते ना तो तुम कुछ नहीं कर पाती.”

दुपट्टा खिंच रहा था शख्स

“हमलोग चुपचाप वहां से सर हट गए. मेरे हसबैंड कॉल कर बुलाते थे. क्योंकि वह बोल नहीं पाते थे. मिस्ड कॉल देते थे तो मैं समझ जाती थी कि कुछ परेशानी है उनको. एक आदमी था वहीं ज्योति कुमार करके एक कंपाउंडर था. उसको मैंने रिक्वेस्ट किया कि भैया प्लीज कि आप मेरे हसबैंड की मदद कर दीजिए कि रात में ये लोग मुझे रुकने नहीं दे रहे मुझे इनके पास. उसने कहा कि ठीक है जरूर मदद करूंगा. यह कहकर मैं अपने हसबैंड से बात करने लगी. इशारे से ही वो बात कर रहे थे. इसी दौरान अचानक से दुपट्टा खिंचाया मेरा जोर से. जब मैं पीछे मुड़ी तो उस आदमी का हाथ मेरे कमर पर था और ज्योति कुमार मेरा दुपट्टा खींच रहा था. मेरी मां पीछे से चिल्लाई. मेरे हसबैंड को पसीना आने लगा. वो कुछ बोल भी नहीं पा रहे थे. मैंने फिर दुपट्टा खींचा और मैं कुछ नहीं बोल पाई डर से कि मेरे हसबैंड यहां पर हैं, मेरी मां यहां पर है ये लोग कुछ कर देगा.”

कई लोगों ने सामने हतोड़ दिया दम

“मेरे हसबैंड की तबीयत उस समय बिगड़ी जब मेरी मदर के बगल वाले बेड पर एक अंकल.. मास्क उनका हट गया था और वो अंकल चिल्ला चिल्लाकर नर्स को बुला रहे थे. मेरी मम्मी चिल्ला रही थी कि जल्दी आइए ये मर जाएंगे. कोई नहीं आया और अंकल ने दम तोड़ दिया. ऐसे तीन-चार लोग उस दो-तीन दिन के अंदर दम तोड़े हैं बिना केयर के. सारी नर्स टेबल-कुर्सी लगाकर सो जाती थी. कहती थी पागल हो गए हैं. हम ही मर जाएंगे इस कोरोना के चक्कर में. बाइपैप उस हॉस्पिटल में नहीं था. मेरे हसबैंड की तबीयत बहुत ज्यादा खराब हो गई. उन्होंने मायागंज रेफर कर दिया भागलपुर. हमलोग मायागंज आए. मायागंज की और हालत खराब. आईसीयू में चार बेड था. मेरे हसबैंड के बगल वाले बेड पर चार लोग छह से सात घंटे में खत्म हुए. मेरे हसबैंड डर गए. शाम होते-होते मेरे हसबैंड की तबीयत अचानक से खराब होने लगी. बहुत ज्यादा तबीयत खराब हो गई. हमलोग को समझ नहीं आ रहा था कि हो क्या रहा है.”

ड्यूटी की जगह मूवी देखते थे लोग

“डॉक्टर को कम से कम पांच छह बार मेरी बहन बुलाने गई है. लेकिन कोई डॉक्टर था ही नहीं ड्यूटी पर. मेरी बहन मायागंज अस्पताल में जब रात में गई बुलाने तो कहते हैं यार सोने नहीं दोगे.. रात में भी सोने नहीं दोगे. जब हमने देखा जाकर सर तो इमरजेंसी के लाइट ऑफ और सब नीचे बिछाकर मोबाइल पर मूवी देख रहे हैं और सो रहे हैं और दरवाजा तक नहीं खोला सर. जब मेरी दीदी बहुत जाकर चिल्लाई तब एक डॉक्टर आया वहां से तो उन्होंने देखा क्या कि ऑक्सीजन मास्क लगा था लेकिन पाइप ही नहीं लगा था मास्क वाला. बस मास्क लगाकर छोड़ दिया. ऑक्सीजन सप्लाई आ ही नहीं रहा था. जब बहुत कम हो गया तो वह डॉक्टर आया और पाइप लगाए. उसी दिन से मेरे हसबैंड के दिमाग में सर ऑक्सीजन की किल्लत का डर बैठ गया. वो इतना डर कि वे बोले कि नहीं अब हमको कहीं बाहर लेकर चलो. दिल्ली में हमने बहुत पता किया सर कहीं भी जगह नहीं था.”

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“हम पटना आए. राजेश्वर हॉस्पिटल में. यहां पर इन्होंने कहा कि आईसीयू में अटेंडेंट नहीं है अलाउड. मेरे हसबैंड रोने लगे कि मेरी वाइफ को बस भेज दो. वो रहेगी तो मैं ठीक हो जाऊंगा. लेकिन नहीं अलाउ किया सर. मेरे हसबैंड बोल नहीं पा रहे थे. वो अंदर से हाथ से इशारा कर रहे थे. मैंने कहा सर वो बुला रहे हैं किसी को बाहर से तो एक डॉक्टर मुझसे कहता है अरे छोड़िए ना वो छौड़ा तो ऐसे ही बौखला रहा है जब से आया है. मैं उस समय कुछ नहीं कर पाई सर.”

पहले ही दिन डॉक्टर बोला था-नहीं बचेगा

“उसके बाद जब उनका ऑक्सीजन लेवल 37 हो गया तब मैंने अपने जीजा जी को बोला कि अब मुझसे नहीं रहा जाएगा. मुझे किसी तरह से अंदर भिजवाइए. तब मुझे उन्होंने जबरदस्ती अंदर भेजा. तब मैंने 37 से 74 कर दिया मेरे बाबू का. मेरे बाबू का ऑक्सीजन लेवल बढ़ा दिया. उसके बाद मैंने बोला कि सर अटेंडेंट अलाउड है.. सारे के अटेंडेंट बैठे हुए थे. तो कहने लगे कि अटेंडेंट नहीं रहेगा तो कैसे काम चलेगा. सब तो कोरोना से बीमार पड़ रहे. हमलोग कितना देखें. मर जाएं खांसते-खांसते. बैठिए चुपचाप और देखिए. मैंने बाबू को बहुत ठीक कर दिया था सर. स्ट्रॉ लगाकर सर मास्क से बाबू को मैंने जूस, दाल-रोटी सबकुछ पिलाया. इतने ठीक हो गए ना कि जो डॉक्टर फर्स्ट डे बोला था ये बचेगा नहीं वो डॉक्टर कहता टचवूड क्या कर दिया आपने. ये तो एकदम ठीक हो गए. गजब का फाइट दिया आप दोनों ने मिलकर. अस्पताल में डेढ़-डेढ़ घंटे तक ऑक्सीजन सप्लाई बंद रहता था.”

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“बाद में हमें पता चला कि ये ब्लैकमार्केटिंग कर रहे हैं अंदर में ऑक्सीजन सिलेंडर का. जो अस्पताल वाले हैं ना वो बंद कर देते थे ताकि बेचैन होकर लोग खरीदे उन्हीं से. मैंने भी खरीदा सर. क्या करते हमें भी तो चाहिए था. फिर एक दिन सिलेंडर मांगते-मांगेत कहीं नहीं मिला और मेरे हसबैंड खत्म हो गए. मेरा बाबू चला गया छोड़ के. यहां पर डॉक्टर था अखिलेश वह गंदे गंदे इशारे करता था. चलता था ना तो हमेशा सटकर क्रॉस करता था. मैं इग्नोर करती थी कि मेरा हसबैंड है यहां पर नहीं तो पटना के बाहर होता चप्पल खोल कर मारती मैं ऐसे इंसान को सर.”

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