कहते हैं कि अगर विपरीत परिस्थितियों में आपकी कोई मदद कर दे या फिर भूखे को खाना, वो इंसान मददगार के लिए किसी फरिश्ते से कम नहीं होता. इस बात से कोई एतराज नहीं जता सकता कि अगर दृढ़ इच्छाशक्ति हो तो किसी भी उम्र के पड़ाव पर असंभव को भी संभव बनाया जा सकता है. खासकर, ऐसे गरीब असहाय की मदद के लिए हाथ उठाना जिन्हें मजबूरन भूखे सोना पड़ता है.

हालांकि, गुजरात राज्य के मोरबी शहर में 74 वर्षीय बचु दादा एक ढाबा चलाते हैं. ढाबे का नाम भी बचुदादा का ढाबा है. खास बात यह है कि यहां से कोई भी शख्स भूखा नहीं लौटता है. गरीब, असहाय या फिर जिनके पास पैसे नहीं हो उन्हें फ्री में ही खाना खिलाते हैं. यह सिलसिला पिछले 40 सालों से चलता आ रहा है.

40 रुपये में भर पेट खाना

बता दें कि 72 वर्षीय बचुदादा की धर्मपत्नी का निधन 10 माह पहले ही हुआ है. अब वो अकेले ही इस ढाबा को चला रहे हैं. इससे पहले उनका साथ देने के लिए पत्नी थी. उनकी थाली की कीमत मात्र 40 रुपये हैं. जिसमें एक साथ तीन स्वादिष्ट सब्जियां, रोटी, दाल, चावल, पापड़ के साथ छाछ भी रहता है.

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ढाबे के आसपास काफी गरीब लोग रहते हैं जिनके पास खाने तक के पैसे भी नहीं होते हैं. ऐसे में दादा उन गरीबों को थोड़े पैसे में भी भरपेट खाना खिलाते हैं. अगर किसी के पास पैसे नहीं होते हैं उन्हें फ्री में ही खाना खिलाते हैं. ये सिलसिला पिछले 40 सालों से चलता आ रहा है. बचु दादा का कहना है कि उनके यहां से कोई भी भूखा नहीं जाना चाहिए.

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