लालू प्रसाद ने की थी सियासी दही-चूड़ा भोज की शुरूआत, झुग्गियों के लोगों को खुद से परोसकर खिलाते

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पटनाः कोरोना संक्रमण काल के कारण इस बार बहुत कुछ परम्पराओं पर विराम सा लग गया है. दही-चूड़ा भोज के जरिये नये राजनीतिक समीकरणों को गढ़ने की परंपरा भी इस बार टूट रही है. आम लोगों भले ही दही-चुड़ा का स्वाद चखेंगे लेकिन सियासी गलियारों में ऐसा कुछ नहीं रहेगा.

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बिहार के सियासी गलियारों में इस बार मकर संक्रांति पर दही-चूड़ा और गुड़ की मिठास नहीं होगी. आरजेडी की तरफ से इस बार पार्टी कार्यालय और राबड़ी देवी के आवास 10 सर्कुलर रोड में दही-चूड़ा भोज का आयोजन नहीं होगा. मकर संक्रांति को लेकर सोशल मीडिया के माध्यम से लालू प्रसाद ने संदेश जारी किया है, जिसमें उन्होंने विधायकों और पार्टी नेताओं को गरीबों को दही-चूड़ा खिलाने का निर्देश दिया है.

दही-चूड़ा भोज से लोगों को जोड़ते थे लालू

दरअसल, बिहार में दही-चूड़ा भोज की शुरुआत बिहार के निवर्तमान सीएम लालू प्रसाद ने 1994-95 में की थी. अपने पहले सीएम कार्यकाल में लोगों को अपने साथ जोड़ने के लिए दही-चूड़ा भोज का आयोजन शुरू किया, इसकी खूब चर्चा हुई जो आगे चलकर आरजेडी की परंपरा बन गई.

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दो दिन चलता था आयोजन

पटना में संक्रांति पर हर साल दो दिन का आयोजन होने लगा. एक दिन नेताओं-कार्यकर्ताओं के लिए जबकि अगले दिन झुग्गी-झोपड़ी वालों के लिए. लालू प्रसाद यादव अपने आवास से सटे झुग्गियों के लोगों को खुद से परोसकर खिलाते.

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बिहार में एक दूसरे कि खिलाफ लंबे अरसे तक सियासत करने के बाद लालू यादव और नीतीश कुमार 2015 में फिर से एक साथ एक मंच पर आए. आरजेडी प्रमुख नीतीश कुमार का साथ लेकर महागठबंधन का निर्माण कर बीजेपी को सरकार बनाने से वंचित कर दिया.

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नीतीश के साथ आने पर लालू ने मकर संक्रांति पर अपने हाथों से दही-चुड़ा खिलाकर दही का तिलकर छोटे भाई नीतीश को आशीर्वाद भी दिया था. हालांकि, चारा घोटाला में सजा काटने की वजह से राबड़ी आवास पर अब पहले जैसा दही-चुड़ा का आयोजन नहीं होता है.

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