पटना: बिहार विधानसभा चुनाव 2020 में कई मंत्रियों और दिग्गज चेहरे को हार का सामना करना पड़ा है. ऐसे में स्व घोषित सीएम उम्मीदवार पुष्पम प्रिया चौधरी को भी चुनाव में बांकीपुर और बिस्फी सीट से करारी से हार का सामना करना पड़ा है. इसके  बाद बुधवार को सोशल मीडिया पर इमोशनल पोस्ट लिखा.

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पुष्पम प्रिया चौधरी लिखती हैं कि आज सुबह हो गयी पर बिहार में सुबह नहीं हुई. मैं बिहार वापस एक उम्मीद के साथ आयी थी कि मैं अपने बिहार और अपने बिहारवासियों की ज़िंदगी अपने नॉलेज, हिम्मत, ईमानदारी और समर्पण के साथ बदलूंगी मैंने बहुत ही कम उम्र में अपना सब कुछ छोड़ कर ये पथरीला रास्ता चुना क्योंकि मेरा एक सपना था-बिहार को पिछड़ेपन और गरीबी से बाहर निकालने का.

विफल रही बदलाव की क्रांति

पुष्पम ने आगे लिखा, बिहार के लोगों को एक ऐसी इज्जतदार ज़िंदगी देना जिसके वो हकदार तो हैं पर जिसकी कमी की उन्हें आदत हो गयी है. बिहार को देश में वो प्रतिष्ठा दिलाना जो उसे सदियों से नसीब नहीं हुई. मेरा सपना था बिहार के गरीब बच्चों को वैसे स्कूल और विश्वविद्यालय देना जैसों में मैने पढ़ाई की है, जैसों में गांधी, बोस, अम्बेडकर, नेहरू, पटेल, मजहरूल हक़ और जेपी-लोहिया जैसे असली नेताओं ने पढ़ाई की थी. उसे इसी वर्ष 2020 में देना क्योंकि समय बहुत तेज़ी से बीत रहा और दुनिया बहुत तेज़ी से आगे जा रही. आज वो सपना टूट गया है, 2020 के बदलाव की क्रांति विफल रही है.

कोशिश कर हार गई पुष्पम

प्रिया ने आगे लिखते हुए कहा कि वो हर छोर, हर जिले में गयी, लाखों लोगों से मिली. हर किसी में बदलाव की बेचैनी दिखी. उस बेचैनी को दिशा देने के लिए जो भी वक्त मिला उसमें मैने और मेरे साथियों ने अपनी तरफ़ से कोई कसर नहीं छोड़ी.  पर हार गए हम. इनकी भ्रष्ट ताकत ज़्यादा हो गयी और आपकी बदलाव की बेचैनी कम. और मैं, मेरा बिहार और बिहार के वो सारे बच्चें जिनका भविष्य पूरी तरह बदल सकती थी, वो हार गया.

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मीडिया को लिया निशाने पर

इस दौरान चौधरी ने मीडिया पर भी निशाना साधा. उन्होंने कहा कि  मीडिया मेरे कपड़ों और मेरी अंग्रेज़ी से ज़्यादा नहीं सोच पायी, बाकी पार्टियों के लिए चीयरलीडर बनी रही और आप नीतीश, लालू और मोदी से आगे नहीं बढ़ पाए. आपकी आवाज तो मैं बन गयी पर आप मेरी आवाज भी नहीं बन पाए और शायद आपको मेरे आवाज़ की जरुरत भी नहीं. इनकी ताकत को बस आपकी ताकत हरा सकती थी पर आपको आपस में लड़ने से फ़ुरसत नहीं मिली.

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पता नहीं कब तक रहेगा अंधेरा

आज अंधेरा बरकरार है और 5 साल, और क्या पता शायद 30 साल या आपकी पूरी ज़िंदगी तक यही अंधेरा रहेगा, आप ये मुझसे बेहतर जानते हैं. आज जब अपनी मक्कारी से इन्होंने हमें हरा दिया है, मेरे पास दो रास्ते हैं. इन्होंने बहुत बड़ा खेल करके रखा है जिसपर यकीन होना भी मुश्किल है. या तो आपके लिए मैं उससे लड़ूँ पर अब लड़ने के लिए कुछ नहीं बचा है ना ही पैसा ना ही आप पर विश्वास, और दूसरा बिहार को इस कीचड़ में छोड़ दूं. निर्णय लेना थोड़ा मुश्किल है. मेरी संवेदना मेरे लाखों कार्यकर्ताओं और समर्थकों के साथ है.

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अंधेर नगरी में जश्न मनाएं
फिलहाल, आप अंधेर नगरी में अंधेरे का जश्न मनाएं और चौपट राजाओं के लिए ताली बजाएं. जब ताली बजा कर थक जाएं, और अंधेरा बरकरार रहे, तब सोचें कि कुछ भी बदला क्या, देखें कि सुबह आई क्या? मैंने बस हमेशा आपकी ख़ुशी और बेहतरी चाही है, सब ख़ुश रहें और आपस में मुहब्बत से रहें.

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